ताइपिंग विद्रोह के कारण तथा परिणामों अथवा महत्व (प्रभाव) का परीक्षण करें। (Examine the causes and effects of Taiping Rebellion.)



ताइपिंग विद्रोह के कारण तथा परिणामों अथवा महत्व (प्रभाव) का परीक्षण करें।

(Examine the causes and effects of Taiping Rebellion.) 

 Ans. चीन की मंचू सरकार देश की रक्षा करने में असफल सिद्ध हुई। इस कारण चीनी लोगों में धीरे-धीरे असंतोष व्याप्त हो रहा था। अतः वे मंचू सरकार के खिलाफ विद्रोह की तैयारी करने लगे। 1864 के पूर्व ही चीन में छोटे-बड़े कुल मिलाकर 100 विद्रोह हुए। केवल 1847 में 26 विद्रोह हुए थे। इन विद्रोहों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ताईपिंग विद्रोह था जो एक ही साथ चीन के 11 प्रांतों में हुआ था।

ताईपिंग विद्रोह के कारण 1. विदेशियों का साम्राज्यवाद साम्राज्यवाद के प्रसार ने चीनी जनता में जागृति की लहर

उत्पन्न कर दी। निरंतर अपमान और निरादर के थपेड़े खाकर राज्य के प्रति लोगों की क्रोधाग्नि प्रज्ज्वलित हो रही थी। वे निर्बल मंचू साम्राज्य की जीर्ण शासन व्यवस्था को सदा के लिए मिटाकर पाश्चात्य ढंग से लोकतंत्र के निर्माण का स्वप्न देखने लगे थे। पश्चिम से चीन को एक नई चेतना मिली थी। अफ़ीम युद्ध के फलस्वरूप चीन को यूरोपीय देशों के साथ कई असमान सधियों पर हस्ताक्षर करने पड़े थे, और विदेशियों को कई तरह की सुविधाएँ प्रदान करनी पड़ी थी। इस कारण चीन के निवासियों का कष्ट बहुत बढ़ गया था।

चीन का राष्ट्रीय गौरव कलकित हो चुका था और उसकी सामाजिक तथा आर्थिक प्रतिष्ठा खत्म हो चली थी। इन बातों को देखकर किसी भी देश के लिए चिन्तित होना बिल्कुल स्वाभाविक था। अतएव चीन के लोगों ने यह सोचा कि यदि पनपते हुए साम्राज्यवाद के खिलाफ तुरंत आवाज नहीं उठाई गई तो चीन सर्वनाश से नहीं बच पाएगा। चीन भी भारत आदि एशियाई देशों की तरह पराधीन देश बन जाएगा। इस तरह की बातें चीन के सभी वर्ग के लोग सोचने लगे थे। 1842 में जब मंचू सरकार ने नानकिंग की संधि की शर्तों को स्वीकार कर लिया तो चीन के जागरूक लोगों की चिंता और भी बढ़ गई। उनके समक्ष अब एक ही मार्ग बच रहा था विद्रोह करके सरकार के खिलाफ असंतोष व्यक्त करना।'

2. कृषकों में असंतोष नानकिंग की संधि के अनुसार करोड़ों रुपयों की जो रकम चीनी सरकार द्वारा ब्रिटेन को प्रदान की जानी थी, उसे प्राप्त करने के लिए सरकार ने किसानों पर अनेक नए कर लगाए। किसानों की दशा पहले ही खराब थी। अब इन अतिरिक्त करों के कारण वे और भी अधिक दुर्दशाग्रस्त हो गए। करों को प्रदान करने के लिए जमींदारों और महाजनों से रुपया उधार लेने के लिए विवश हुए, जिसका सूद अदा कर सकना भी उनके लिए कठिन था। परिणाम यह हुआ कि बहुत से किसानों ने अपनी जमीनें साहूकारों को बेच दी, और वे स्वयं मजदूरी कर अपना गुजारा करने लगे। इस समय चीन के किसानों में बहुत असंतोष था। अपनो आर्थिक दुर्दशा को पूरी जिम्मेवारी चीनी किसानों ने मंचू सरकार के माथे मढ़ी।

3. सरकार की कमजोरी (आंतरिक अव्यवस्था) - ताओं-कुआगे एक दुर्बल तथा अयोग्य शासक था और उसके बाद हसान फेंग (Hsien Fang) हुआ। इसके समय चीन का सम्पूर्ण शासनतंत्र भ्रष्ट हो चला था। जनता का कोई भी काम बिना घुस दिए नहीं हो सकता। सरकारी अफसर और कर्मचारी मनमानी करते थे, और अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके जनता को बहुत सताते थे। सरकार के किसी भी अंग में कार्यकुशलता नहीं रह गयी थी। देश में विदेशी साम्राज्यवाद कायम हो रहा था। आर्थिक शोषण का नया प्रारम्भ हो चुका था, लेकिन इसके लिए मंचू सरकर

एकदम चितित नहीं थी। चीनी सरकार बेखबर सोयी हुई थी। देश में सुधार की आवश्यकता थी. इस बात का उसे जरा भी ख्याल नहीं था। ऐसी सरकार के विरूद्ध लोगों में विद्रोह की भावना आना जरूरी था। 4. गुप्त समितियाँ इस नयी भावना से प्रेरित होकर चीन के लोग विद्रोह की बात सोचने


लगे। खुले रूप से विद्रोह करना चीन में सम्भव नहीं था। चीनी जनता को कोई राजनीतिक सुविधा


नहीं थी। सार्वजनिक तौर पर लोग अपनी शिकायतें सरकार के समक्ष नहीं रख सकते थे। अतएव


उन्होंने गुप्त संगठनों या समितियों का निर्माण किया। देखते-देखते देश में ऐसे संगठनों का जाल


बिछ गया। इन संगठनों के नेता और सदस्य उग्रवादी थे। मंचू सरकार के प्रति उनकी घृणा बड़ी


तीव्र थी। राष्ट्रीय अपमान और देश की राजनीति आर्थिक दुर्व्यवस्था की सारी जिम्मेवारी उन्होंने मैच


सरकार पर लाद दी। इस शासन का अंत करने के लिए वे सक्रिय हो उठे।


5. सैनिक दुर्बलता - सैनिक शक्ति मंचू साम्राज्य का आधार था। प्रारम्भ में मंचू नेताओं ने उनकी शक्ति बनाये रखने के उद्देश्य से अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। वे सैनिक वृत्ति के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं कर सकते थे तथा राजकोष से उन्हें वृत्ति दी जाती थी। उनको चीन के मूल निवासियों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए भी निरुत्साहित किया जाता था। वैवाहिक संबंध अपनी जाति में करने का प्रयत्न किया जाता था। युद्ध काल तथा देश की रक्षा के लिए उन्हें अनेक प्रकार के कठोर अनुशासन द्वारा तत्पर रखा जाता था। परन्तु 18वीं सदी के मध्य से प्रशासन ने इनके अनुशासन के प्रति रुचि लेना बन्द कर दिया। इससे उनकी कार्यकुशलता में कमी आयी। आगे, प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार ने सैनिक जीवन को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया। सैनिक पदाधिकारी सैनिकों को दिये जाने वाले वेतन को स्वयं रख लेते थे, तथा निरीक्षण के समय कुलियों तथा मजदूरों को भर्ती कर लेते थे। इन सब का परिणाम यह हुआ कि अनेक प्राचीन सैनिक परिवारों ने आजीविका प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक व्यवसायों को आरम्भ कर दिया। इधर सैनिकों के प्रशिक्षण पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया। अतः यह स्वाभाविक था कि सैनिक शक्ति दिन पर दिन दुर्बल हो गयी और आंग्ल-चीनी या अफीम (प्रथम) युद्ध में जिस सरलता से चीनी सेनाएँ पराजित हो गई, फलतः मंचू साम्राज्य की शक्ति का भय गुप्त समितियों के नेताओं तथा सर्वसाधारण पर से समाप्त हो गया, और वे विद्रोह को उद्यत हो गये।


6. देशव्यापी अराजकता देशव्यापी अराजकता ने विद्रोह के लिए कमरा बनाया 1843 में हुनान प्रांत के निवासियों ने अपने प्रांत के चावल का निर्यात रोकने के लिए सशस्त्र विद्रोह किया। इन्होंने राज कर्मचारियों को मार डाला और प्रांत के सारे प्रशासन पर अपना अधिकार कर लिया 1844 में विद्रोह हुआ। चीनी प्रशासन इस प्रकार के विद्रोहों को सशस्त्र डकैती समझता रहा। राष्ट्रीयता की भावना से परिपूर्ण देशव्यापी ये विद्रोही अपनी स्वतंत्रता के लिए युद्धरत थे जिनका उद्देश्य विदेशी मंचू तथा बर्बर पाश्चात्य व्यापारियों को देश से निकाल बाहर करना था।

7. क्वावतुंग में विद्रोह तथा ताईपिंग तिएन कुओ की स्थापना - इसी समय (1849) में क्वावतुंग में बड़ा भारी दुर्भिक्ष पड़ा। मंचू साम्राज्य ने इस दुर्भिक्ष में जनता के कष्टों को दूर करने के लिए कोई प्रयत्न न किया। चारों ओर हाहाकार मच गया। भ्रष्ट राज्य कर्मचारी जन कष्टों को अवहेलना करते रहे और अपनी जेब भरते रहे। हुंग हसिऊ-चुआन ने इसे मंचू साम्राज्य का अन्त करने का अवसर समझा। अतः उसने उसके द्वारा संगठित धार्मिक समिति,

शांग-ती-हुई (ईश्वर पूजकों की संस्था) को राजनीतिक संगठन में परिवर्तित कर ताईपिंग में विद्रोह कर दिया और 15 जनवरी, 1851 को ताईपिंग तिएन कुओ (Taiping ti-en-kuo) अर्थात् महान या चिर शांति के दैवी राज्य की स्थापना की घोषणा कर दी और स्वयं ने तिएन-वांग, अर्थात् ईश्वरीय सम्राट की उपाधि धारण कर ली।

सर्वप्रथम ताईपिंग क्रांतिकारियों ने देश के विभिन्न भागों की विजय का प्रयत्न किया। 1853 तक उन्होंने ह्वानयांग (Hanyang), वूचांग (Wuchang), बहू (Wuhu) आदि महत्त्वपूर्ण प्रांतों पर


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