Choice Based Credit System (CBCS) / चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम क्या है




 

CBCS का फुल फॉर्म चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (Choice Based Credit System) होता है जिसे हिंदी में विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली कहते हैं | यह  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा प्रस्तावित एक अवधारणा हैजो छात्रों के लिए उदारीकरण (Liberalisation) एवं वैश्विकरण (Globalisation) शिक्षा की बात करता है | CBCS उच्च शिक्षा में छात्रों को 3 तरीके से विषयों को चलाने और चुनने की आजादी देता है – 

(i) मूल पाठ्यक्रम (Core Courses)

(ii) ऐच्छिक पाठ्यक्रम(Elective Courses) और 

(iii) क्षमता वृद्धि पाठ्यक्रम (Ability Enhancement Courses) 

   

   

          उपर्युक्त पाठ्यक्रम के तहत छात्रों को कई तरह की आजादी देकर पाठ्यक्रम को छात्र केन्द्रित (Student focused) बनाया गया है | यह प्रणाली एक देश एक पाठ्यक्रम की बात करती है | अर्थात् भारत के सारे विश्वविधालय में एक ही पाठ्यक्रम चलाने पर जोर देता है | साथ ही यह वैसे छात्रों को भी पढाई वही से शुरू करने की आजादी देता है जिसका किसी कारणवश या बीमारी से बीच में ही पढाई छोड़नी पड़ी थी | ऐसे छात्र चाहे तो वह उसी विश्वविधालय में या किसी अन्य विश्वविधालय में जाकर अपना अध्ययन उसी सेमेस्टर से चालू कर सकता है | अर्थात यह छात्रों को किसी भी समय एक शैक्षिक संगठन से दूसरे में जाने के लिए एक सरल और लचीला तरीका प्रदान करता है | फलस्वरूप कोई छात्र अपने पूर्व पाठ्यक्रम को खोये बिना दुसरे संस्थान में क्रेडिट हस्तांतरण कर सकता है |  जैसे – उदाहरण के लिए यदि एक छात्रअन्ना विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग में अध्ययन कर रहा था और वह इसे मुंबई विश्वविद्यालय में जाकर जारी रखना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। 

   

    

        साथ ही यह प्रणाली विषय विकल्प चुनने की भी आजादी देता है | अर्थात कोई छात्र विज्ञान के विषयों के साथ चित्रकारी की इक्षा रखता है तो वह ऐसे विषयों का भी चुनाव कर सकता है | यानि विद्यार्थी अपने कोर्स में से कुछ विषय हटाकर अन्य स्ट्रीम के अपने पसंदीदा एक या दो विषय को चुन सकता है | यह कौशल आधारित अध्ययन (Skill based learning) पर भी बल देता है | यह प्रणालियों शिक्षा के उद्देश्यों को संरक्षित करते हुए स्मार्ट और एकीकृत कक्षा (Integrated Classroom) सीखने के अवसर प्रदान करता है | 

यह कैसे काम करता है ? (How does it work ?) 

यह तीन तरीके से काम करता है – सेमेस्टर, क्रेडिट, और क्रेडिट ट्रांसफर | 


(i) सेमेस्टर सिस्टम (semester system) – इसमें छात्रों का मूल्यांकन सेमेस्टर के अनुसार किया जाता है | एक छात्र विज्ञान, कला, वाणिज्य के लिए साल या इंजीनियरिंग के लिए साल देता है | वह सेमेस्टर के आधार पर बटा हुआ होता है | प्रत्येक सेमेस्टर में 15 से 18 सप्ताह के शैक्षणिक कार्य होंगे | जो 90 शिक्षण दिनों के बराबर होता हैं | पाठ्यक्रम की सामग्री और शिक्षण के घंटे के आधार पर पाठ्यक्रम बनाने और क्रेडिट प्रदान किया जाता है | 1 semester = 90 Educational Days 

(ii) क्रेडिट सिस्टम (Credit System) -  प्रत्येक पाठ्यक्रम को एक निश्चित क्रेडिटसौंपा गया है | जब छात्र उस पाठ्यक्रम से गुजरता है तो वह उसका क्रेडिट अर्जित करता है | यदि कोई छात्र किसी सेमेस्टर में एक पाठ्यक्रम पास करता है तो उसे बाद में उस पाठ्यक्रम को दोहराना नहीं पड़ता है | छात्र अपनी गति के अनुसार क्रेडिट कमा सकते हैं | 


(iii) क्रेडिट ट्रान्सफर (Credit Transfer) - इसके तहत यदि किसी कारण कोई छात्र अध्ययन कार्य नहीं कर सकता है या फिर वह बीमार हो जाता है तो ऐसी स्थिति में पाठ्यक्रमों का अध्ययन करने और कम क्रेडिट अर्जित करने का भी नियम बनाया गया है जिस नियम के तहत अगले सेमेस्टर में वह अपने क्रेडिट पूरे कर सकता है | 

क्रेडिट कैसे गिना जाता है ? (How is Credit counted ?) 

क्रेडिट तीन तरीके से अर्जित किया जाता है - 

1. प्रति सप्ताह व्याख्यान (Lecture) 

2. ट्यूटोरियल (Tutorial) 

3. व्यवहारिक कार्य (Practical)

Grading System –

10 सूत्री ग्रेडिंग प्रणाली निम्न तरीके से प्रदान किया जाता है |


Short form

Term

Points

O

Outstanding

10

A+

Excellent

09

A

Very Good

08

B+

Good

07

B

Above Average

06

C

Average

05

P

Pass

04

F

Fail

00

Ab

Absent

00



CBCS  के लाभ (Benefits of CBCS) -
1. Credit System एक छात्र को अपने अनुसार अध्ययन करने की अनुमति देता है | 
2. अतिरिक्त पाठ्यक्रमों के लिए विकल्प चुन सकते हैं और आवश्यकता से अधिक  क्रेडिट प्राप्त कर सकते हैं | 
3. देश के भीतर और बाहर के कॉलेज / विश्वविद्यालय में क्रेडिट के हस्तांतरण किया जा सकता है | CBCS  के नुकसान (Disadvantage of CBCS) - 

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